मध्यप्रदेश: खेती में नंबर 1 राज्‍य में किसानों की दुर्दशा कैसे बनी चुनावी मुद्दा- madhya-pradesh-chhattisgarh

नई दिल्ली: मध्यप्रदेश में इस साल अक्टूबर में विधानसभा चुनाव होने हैं और अभी से साफ हो गया है कि इन चुनावों का सबसे बड़ा मुद्दा किसान होंगे. यकीन न हो तो सियासी कैलेंडर पलटकर देखिए- मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान 30 मई को मंदसौर में खेतिहर मजदूरों की बड़ी सभा की तैयारी कर रहे हैं. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी 6 जून को मंदसौर में अब तक की सबसे बड़ी किसान रैली का ऐलान कर चुके हैं. दर्जनों किसान संगठनों ने एक से 10 जून के बीच मध्यप्रदेश में किसान आंदोलन करने की घोषणा कर रखी है. 6 जून को मंदसौर में सुरक्षाबलों की गोली से पिछले साल मरे 6 किसानों की बरसी है. सरकार किसानों के आंदोलन को लेकर इतनी ज्यादा दबाव में है कि पुलिस के लिए 15,000 नए डंडे खरीदे जा रहे हैं. क्या बूढ़ा और क्या जवान, हर किसान से हिंसा न करने के बॉन्ड भरवाए जा रहे हैं. किसान आंदोलन के दौरान ज्यादा दिक्कत न हो इसके लिए सब्जी से लेकर दूध तक का स्टॉक रखने की तैयारी चल रही है. और सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि सब्जी बेचने वालों को हथियारबंद जवानों के पहरे में लाया जाएगा, ताकि उन्हें कोई नुकसान न पहुंचाया जा सके.क्या ये सारी बातें उस राज्य के लिए असामान्य नहीं हैं, जिसे पिछले 10 साल से निर्विवाद रूप से देश में खेती-किसानी में अव्वल माना जा रहा हो. जब पूरे देश की कृषि विकास दर 2 फीसदी के लिए तरस रही हो, तब उस राज्य में कृषि विकास दर कभी 10 फीसदी से नीचे ही नहीं आई. जो राज्य चुनिंदा फसलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के साथ ही बोनस भी देता रहा हो. जिस राज्य का मुख्यमंत्री नीति आयोग में देश की कृषि नीति तय करने वाली कमेटी का मुखिया हो. ऐसे राज्य में सामान्य मानसून के पूर्वानुमान के बावजूद किसानों की दुर्दशा अगर चुनावी मुद्दा बन जाए तो सोचना पड़ेगा कि देश ने खेती के बारे में कहीं गलत रोल मॉडल तो नहीं चुन लिया. या कहीं ऐसा तो नहीं कि खेती के बारे में हम इतने नाकाम हुए कि मध्यप्रदेश हमारी कामयाबी का सबसे बड़ा पैमाना बन गया.मध्यप्रदेश की कामयाबी की कहानी मध्यप्रदेश देश का प्रमुख खाद्यान्न उत्पादक राज्य तो पहले से था, लेकिन शिवराज सिंह चौहान के 2004 में मुख्यमंत्री बनने के बाद से प्रदेश का कृषि विकास एक अफसाना सा बन गया. राज्य में 2004-05 में जहां 73.2 लाख मीट्रिक टन गेहूं का उत्पादन होता था, वहीं यह 2016-17 में बढ़कर 219 लाख मीट्रिक टन हो गया. इस तरह 12 साल में एमपी का गेहूं उत्पादन करीब चार गुना बढ़ गया. पिछले पांच साल में राज्य की कृषि विकास दर 18 फीसदी के करीब बनी रही. इसमें सूखे के साल भी शामिल हैं. गेहूं और धान के साथ मध्यप्रदेश ने सरसों के उत्पादन में भी झंडे गाड़े. मध्यप्रदेश को वर्ष 2011-12, 2012-13 और 2014-15 में खाद्यान्न उत्पादन के लिए देश का सबसे बड़ा पुरस्कार कृषि कर्मण पुरस्कार मिला. यही नहीं, 2013-14 और 2015-16 के लिए उसे सर्वश्रेष्ठ उत्पादन के लिए यही पुरस्कार मिला. यानी पांच साल से देश के सबसे बड़े कृषि पुरस्कार पर एमपी का कब्जा है. इस चमत्कारी ग्रोथ के पीछे मुख्य वजह मध्यप्रदेश में इस दौरान 8 लाख हेक्टेयर में सिंचाई की सुविधा का सुलभ होना माना गया. इसके अलावा किसानों को शून्य ब्याज पर दिया गया कर्ज और गेहूं-धान पर एमएसपी के अलावा दिया जाने वाला बोनस भी इसकी बड़ी वजह रहा. हाल यह रहा कि गेहूं उत्पादन में एमपी ने पंजाब और हरियाणा तक को पीछे छोड़ दिया. प्रदेश में इस दौरान बिछी वेयर हाउस और कोल्ड स्टोरेज की चेन ने भी मध्यप्रदेश के कृषि प्रयोग को नई ऊंचाइयां दीं. खेती की हालत में आए इस जबरदस्त बदलाव ने मध्यप्रदेश की खेतों की सूरत बदल दी. लेकिन खेती के यही बदलाव, खेतिहर समाज के लिए नई समस्याएं भी ले आए. ज्यादा उत्पादन बन गया किसान का संकट देश में जब-जब कृषि संकट का जिक्र आता है तो चौड़ी दरारों वाली सूखी जमीन पर करम पर हाथ रखे बैठे किसान की तस्वीर सामने आती है. लेकिन मध्यप्रदेश का संकट कई मामले में इससे अलग है. यहां संकट खेती पर नहीं आया, किसान पर आया. इस संकट को समझने के लिए एक बार फिर मंदसौर चलना पड़ेगा, जहां किसानों के नाम पर सियासी समर छिड़ने वाला है. पिछले साल के जिस गोलीकांड की बरसी मनाई जा रही है, असल में तब हुआ क्या था. इस कहानी का सिरा पकड़ने के लिए दो साल पीछे जाना पड़ेगा, जब देश में दलहन की फसल कम हुई थी और दालों के दाम 200 रुपये किलो तक पहुंच गए. इस संकट से बचने के लिए सरकार ने एक तरफ विदेशों से दाल आयात करने का फैसला किया, तो दूसरी तरफ किसानों को खूब दाल पैदा करने के लिए प्रोत्साहित किया. किसानों को भी लगा कि दाल में तेजी है, इसलिए दाल का रुख किया जाए. मौसम ने भी साथ दिया. नतीजा यह हुआ कि अगले साल एक तरफ किसानों ने बंपर दलहन की फसल पैदा की और दूसरी तरफ विदेशों से भी बड़े पैमाने पर दाल आ गई. दाल की भरमार से दालों के दाम बुरी तरह टूट गए. दाल एमएसपी से काफी कम दाम पर बिकने लगी. सरकार वादा तो करती रही, लेकिन किसान की दाल एमएसपी पर नहीं खरीद पाई. मंडियों में होने वाली परेशानी और आढ़तियों की ज्यादती ने आग में घी का काम किया. इस तरह वाजिब दाम के लिए उग्र किसान आंदोलन हुआ, जिसमें 6 किसानों की मौत हो गई.
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