होली के त्योहार में कैसे शुरू हुई भांग की परंपरा?


 

इस बार कोरोना वायरस के प्रकोप के चलते कई जगहों पर सार्वजनिक तौर पर सजने वाली दुकानें या तो कम दिखेंगी या फिर नहीं. होली के त्योहार पर खानपान की बात की जाए तो दो व्यंजनों की बात तो होती ही है, एक गुजिया और दूसरी ठंडाई. ठंडाई वह पेय है, जो सर्दियों के जाने और गर्मियों के आने के बीच स्वादिष्ट और पौष्टिक आहार माना गया है, लेकिन होली परंपरा में इसका सीधा संबंध भांग के साथ रहा है.

आपको बताते हैं कि भांग के साथ होली का संबंध कैसे पारंपरिक तौर पर रहा है. भांग का सीधा संबंध भगवान शिव के साथ रहा है, लेकिन होली के साथ भांग की परंपरा के पीछे शिव से सीधे तौर पर जुड़ी कहानी नहीं है.

एक किंवदंती के अनुसार शिव वैराग्य में थे और अपने ध्यान में लीन. पार्वती चाहती थीं कि वो यह तपस्या छोड़ें और दांपत्य जीवन का सुख भोगें. तब कामदेव ने फूल बांधकर एक तीर शिव पर छोड़ा था ताकि उनका तप भंग हो सके. इस कहानी के मुताबिक वैराग्य से शिव के गृहस्थ जीवन में लौटने के उत्सव को मनाने के लिए भांग का प्रचलन शुरू हुआ. लेकिन कथाएं तो और भी हैं.एक और कम सुनी जाने वाली कहानी की मानें तो भगवान शिव और विष्णु की दोस्ती के प्रतीक के तौर पर श्रद्धालु भांग का सेवन करते हैं. इस किंवदंती के अनुसार भक्त प्रहलाद को मारने की भरसक कोशिश करने वाले हिरण्यकश्यप का संहार करने के बाद नरसिम्हा काफी क्रोधित थे. तब उन्हें शांत करने के लिए आधे शेर और आधे पक्षी के तौर पर भगवान शिव ने शरभ अवतार लिया था. भांग और होली के बीच रिश्ते को लेकर समुद्र मंथन की भी एक कहानी है.

धार्मिक मान्यताओं में कहा जाता है कि समुद्र मंथन के दौरान जो अमृत निकला था, उसकी एक बूंद मंदार पर्वत पर गिर गई थी. इसी बूंद से एक पौधा पैदा हुआ, जिसे औषधीय गुणों वाला भांग का पौधा माना जाता है. दूध में बादाम, पिस्ता और काली मिर्च के साथ थोड़ी सी भांग मिलाकर बनाई जाने वाली ठंडाई लो​कप्रिय पेय रहा है. कहते हैं तनावमुक्ति के लिए भांग का सेवन देश भर में कई तरह से किया जाता है. खासकर होली के समय मिठाइयों, पकवानों और पान जैसी चीज़ों में भांग मिलाकर खाई खिलाई जाती है.

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